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क्या सच में अपने हमेशा अपने होते हैं?
"अपनों का खेल" एक मार्मिक और सशक्त कहानी है-भरोसे, विश्वासघात और अडिग हिम्मत की।
एक साधारण जीवन जीने वाला व्यक्ति अपने ही लोगों पर आँख बंद करके भरोसा करता है,
लेकिन बदले में उसे मिलता है धोखा, अपमान और बिखरते हुए रिश्तों का दर्द।
रिश्तों की आड़ में खेले गए इस खेल में हर चाल उसे तोड़ने की कोशिश करती है।
जब किस्मत साथ छोड़ देती है और अपने भी मुँह मोड़ लेते हैं,
तब उसके सामने सिर्फ दो रास्ते बचते हैं-हार मान लेना या फिर खुद को फिर से खड़ा करना।
अपनी मेहनत, जिद और हौसले के दम पर वह शून्य से शुरुआत करता है,
और हर दर्द को अपनी ताकत बनाकर एक नई पहचान गढ़ता है।
यह कहानी सिर्फ संघर्ष की ही नहीं बल्कि उस सच्चाई की है जहाँ सबसे गहरे घाव अक्सर अपने ही देते हैं।
अगर आपने कभी भरोसा किया है... और टूटे हैं,
तो यह किताब आपको फिर से उठने की ताकत देगी।
एक ऐसी कहानी जो आपको सोचने पर मजबूर करेगी-
कि असली खेल बाहर वालों का नहीं, अपनों का होता है।
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